प्रसन्नता
प्रसन्नता क्या है ? इसका जीवन में क्या महत्त्व है ? प्रसन्नता से आप क्या पा सकते हैं ? प्रसन्नता कैसे प्राप्त हो और खिन्नता से कैसे मुक्ति मिले ? तो चलिए इसी रहस्य से पर्दा हटाते हुए नीचे दिए गए कुछ बातों को समझने का प्रयास करते है।

प्रसन्नता क्या है ?
प्रसन्नता मानवों में पाई जाने वाली भावनाओं में सबसे सकारात्मक भावना है । प्रसन्नता एक आध्यात्मिक वृत्ति है , एक दैवीय चेतना है । असलियत में प्रसन्नता का कोई रहस्य नहीं है। ये मन का एक भाव है ।
प्रसन्नता आपका अनमोल खजाना है। प्रसन्नता लुटाइए , उसका खजाना बढ़ता चला जाएगा ।भलाई करना कर्त्तव्य नहीं, आनन्द है । क्योंकि वह प्रसन्नता को पोषित करता है । सबको प्रसन्न करने की शक्ति सब में नहीं होती । प्रसन्नता आत्मा को शक्ति प्रदान करती है । प्रसन्नतापूर्वक उठाया गया बोझ हल्का महसूस होता है ।
प्रसन्नता का जीवन में क्या महत्त्व है?
मन की प्रसन्नता ही व्यवहार में उदारता बन जाती है । प्रसन्न रहना हमारा फर्ज है । यदि हम प्रसन्न रहेंगे तो अज्ञात रूप से विश्व की बहुत भलाई करेंगे। औरों को प्रसन्नता दिए बिना प्रसन्न रहने का अधिकार नहीं है।
जिदंगी ‘ बेहतर ‘ तब होती है. जब आप खुश होते है…लेकिन जिंदगी ‘बेहतरीन’ तब होती है, जब आपकी वजह से लोग खुश होते है..
प्रसन्नता और शोक मन की स्थितियाँ हैं और मन को वश में रखना मानव के हाथ में है । जो क्षण प्रसन्नता प्रदान करते हैं , वे हमें बुद्धिमान भी बनाते है। दूसरों को प्रसन्न रखने की कला प्रसन्न होने में है । प्रसन्नता से स्वास्थ्य मिलेगा और उदासी से रोग । इसलिए प्रसन्न रहना सीखिए, यही श्रेष्ठ पूजा है ।
प्रसन्नचित्त व्यक्ति में रचनात्मक शक्ति अधिक होती है । प्रसन्नता देह और मन दोनों की मित्र है । जन्म और मृत्यु का कोई इलाज नहीं सिवाय इसके कि हम बीच के समय को खुशी से गुजार सकें । यदि हम प्रसन्न हैं तो सारी प्रकृति ही हमारे साथ मुस्कराती प्रतीत होती है । प्रसन्नचित्त व्यक्ति प्रत्येक वातावरण में सबको उत्साहित करते हैं और जीवन की कला को प्रसन्नता द्वारा सिखाते है।
प्रसन्नता कैसे प्राप्त होता है ?
जो बड़ों की सेवा नहीं करते , वे जीवन में सुखी नहीं रहते । मुस्कान से सजे चेहरे द्वारा किया गया स्वागत जलपान और भोज के बराबर होता है । मन की प्रसन्नता से तुम अपने तमाम मानसिक व शारीरिक रोग दूर कर सकते हो ।
आप कितने आस्तिक हैं और कितने आध्यात्मिक , पता आपके खिलखिलाते चेहरे और प्रसन्नता भरी आँखों की चमक से चलता है । दुनिया में प्रसन्न रहने का एक ही उपाय है, और वह यह कि अपनी जरूरत कम करो ।
प्रसन्नता से आप क्या पा सकते हैं ?
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से खुलकर हँसना , मुस्कराना और प्रसन्न रहना दवा के समान है । प्रसन्नचित्त व्यक्ति कभी अपने कर्म में असफल नहीं होता । चित्त के प्रसन्न रहने से सब दुःख नष्ट हो जाते हैं । जिसे प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है , उसकी बुद्धि तुरन्त स्थिर हो जाती है ।

यदि प्रसन्नता स्वभाव में बस गई है तो रोग कभी पास नहीं आएगा। निश्छल मुस्कान से आप अपनों को जहाँ प्रसन्न करते हैं, वहीं शत्रु उससे पूरी तरह काँप उठता है। कर्ण ने तभी तो कहा था कि वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता , लेकिन कृष्ण की मुस्कान उसके समूचे अस्तित्व को हिला जाती है।
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और अंत मे यही कहूँगा की लोगों को इस बात की बड़ी सावधानी रखनी चाहिए कि वह इतना अधिक बुद्धिमान न हो जाए कि हँसने जैसी महान् खुशी से अलग रहने लगे । मरना अच्छा है या जीना , यह हम नहीं जानते इसलिए प्रसन्नता से जीयो और मरने से भय न रखो ।
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